देशद्रोह के मामले में देहरा के अभिषेक को 7 महीने बाद हाईकोर्ट से जमानत! पाकिस्तानी से चैट तथा मीडिया पोस्ट को देशद्रोह नहीं माना जा सकता: हिमाचल हाईकोर्ट

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हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल फेसबुक पर फोटो, वीडियो या विचार साझा करना अपने-आप में देशद्रोह नहीं माना जा सकता, जब तक उससे सार्वजनिक शांति भंग होने या हिंसा भड़कने का प्रत्यक्ष खतरा न हो।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने कांगड़ा जिले के देहरा थाना में दर्ज एफआईआर संख्या 71/2025 से जुड़े मामले में नियमित जमानत याचिका स्वीकार करते हुए की। आरोपी युवक पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 152 (पूर्व में आईपीसी की धारा 124A – राजद्रोह) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

क्या था मामला

पुलिस के अनुसार आरोपी पर आरोप था कि उसने फेसबुक पर प्रतिबंधित हथियारों की तस्वीरें, पाकिस्तान का झंडा और कुछ वीडियो अपलोड किए थे। इसके अलावा उस पर कथित रूप से पाकिस्तानी नागरिकों से बातचीत करने, “ऑपरेशन सिंदूर” की आलोचना करने और खालिस्तान के समर्थन जैसे विचार व्यक्त करने के आरोप लगाए गए थे। हालांकि पुलिस की तलाशी के दौरान आरोपी के घर से कोई भी प्रतिबंधित हथियार बरामद नहीं हुआ और केवल मोबाइल फोन जब्त किया गया।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

  • केवल सरकार की आलोचना करना या शांति की बात करना राजद्रोह नहीं है।

  • किसी पोस्ट या बयान को देशद्रोह मानने के लिए यह जरूरी है कि उसमें हिंसा भड़काने या सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने की मंशा साफ दिखाई दे।

  • आरोपी द्वारा साझा की गई सामग्री से प्रथम दृष्टया ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि उससे देश की अखंडता या सार्वजनिक शांति को खतरा उत्पन्न हुआ हो।

  • “खालिस्तान जिंदाबाद” जैसे नारे भी, यदि उनसे कोई वास्तविक अव्यवस्था या हिंसा नहीं होती, तो अपने-आप में अपराध नहीं बनते—यह सिद्धांत पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित किया जा चुका है।

जमानत मंजूर

अदालत ने यह भी कहा कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और ट्रायल शुरू होने वाला है, ऐसे में आरोपी को अनावश्यक रूप से हिरासत में रखना उचित नहीं होगा। इसी आधार पर आरोपी को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और समान राशि की जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए गए, साथ ही कुछ सख्त शर्तें भी लगाई गईं।

कानूनी और सामाजिक महत्व

यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को रेखांकित करता है। अदालत ने दोहराया कि कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को विचार व्यक्त करने के कारण दंडित करने के लिए नहीं, बल्कि वास्तविक खतरे की स्थिति में ही किया जाना चाहिए।

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