186 नियुक्तियों के दस्तावेजों का सत्यापन नहीं
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 से 2023 के बीच हुई 186 नियुक्तियों में अभ्यर्थियों के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों, ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्रों तथा अन्य दस्तावेजों का संबंधित जारी करने वाले प्राधिकरणों से सत्यापन नहीं कराया गया। CAG ने इसे गंभीर लापरवाही माना है।
UGC नियमों के विपरीत नियुक्तियों पर सवाल
ऑडिट में पाया गया कि कुछ नियुक्तियां विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के अनुरूप नहीं थीं। एक मामले में आवश्यक योग्यता पूरी न होने के बावजूद चयन किया गया, जबकि एक अतिथि शिक्षक की नियुक्ति में भी निर्धारित पात्रता शर्तों का पालन नहीं किया गया।
₹11.19 करोड़ खर्च, फिर भी ERP परियोजना अधूरी
विश्वविद्यालय के डिजिटलीकरण के लिए शुरू की गई ERP परियोजना पर 11.19 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन सात वर्ष बीतने के बाद भी 37 में से 30 मॉड्यूल पूरी तरह कार्यशील नहीं हो सके। इससे परीक्षा प्रबंधन, शोध और प्लेसमेंट जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं प्रभावित हुईं।
करोड़ों की वैज्ञानिक मशीनें वर्षों से बंद
भौतिकी विभाग में स्थापित लगभग ₹1.59 करोड़ की स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप (SEM) सहित कई महंगे उपकरण पिछले कई वर्षों से खराब पड़े हैं। CAG ने कहा कि इन उपकरणों के अनुपयोगी रहने से शोध कार्य प्रभावित हुआ और शोधार्थियों को अन्य संस्थानों पर निर्भर रहना पड़ा।
27 से 37 प्रतिशत तक शिक्षकों की कमी
रिपोर्ट के अनुसार विश्वविद्यालय में 2020-23 के दौरान शिक्षकों के स्वीकृत पदों में 27 से 37 प्रतिशत तक रिक्तियां बनी रहीं। इससे शिक्षकों पर अतिरिक्त कार्यभार बढ़ा और विद्यार्थियों को शैक्षणिक मार्गदर्शन प्रभावित हुआ।
19 साल से नहीं बदला कुछ पाठ्यक्रमों का सिलेबस
ऑडिट में सामने आया कि कुछ पाठ्यक्रमों का सिलेबस वर्ष 2005 के बाद संशोधित ही नहीं किया गया। इसके अलावा कई बोर्ड ऑफ स्टडीज समय पर गठित नहीं किए गए, जिससे पाठ्यक्रम विकास की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
शोध और नवाचार के क्षेत्र में भी पिछड़ा HPU
214 शिक्षकों पर मात्र 21 शोध परियोजनाएं संचालित होने का तथ्य सामने आया। NIRF रिपोर्टों में भी HPU की कमजोर रैंकिंग के पीछे शोध परियोजनाओं और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) के क्षेत्र में कमजोर प्रदर्शन को प्रमुख कारण बताया गया है।
11 अकादमिक चेयर आज तक नहीं हुईं सक्रिय
विश्वविद्यालय में स्थापित 16 अकादमिक चेयर में से 11 वर्षों बाद भी कार्यशील नहीं हो सकीं। वहीं 24 एमओयू में से केवल पांच ही सक्रिय पाए गए।
CAG की टिप्पणी
रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्वविद्यालय के घोषित लक्ष्यों और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर है। समयबद्ध और समन्वित सुधारों के बिना उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और संस्थागत क्षमता को मजबूत करना कठिन होगा
आपको बता दें कि 2019 के बाद से SFI छात्र संगठन ने भर्तियों के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था और इन भर्तियों को अवैध बताया था, ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि अब छात्र संगठन SFI इस कैग की रिपोर्ट को आधार बनाकर जन हित याचिका दायर कर सकता है
