नीरज भारती ने अपने पद से इस्तीफा देते हुए आरोप लगाया कि पार्टी में समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी हो रही है और संगठन कुछ लोगों तक सीमित होकर रह गया है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने मुख्यमंत्री सुक्खू के नेतृत्व पर सवाल उठाए हों। हिमाचल कांग्रेस के इतिहास में शायद वे पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपनी ही सरकार और मुख्यमंत्री के खिलाफ इतने मुखर और सार्वजनिक ढंग से आवाज उठाई है।
विवाद तब और गहरा गया जब सोशल मीडिया पर की गई उनकी टिप्पणियों के बाद उन्होंने आरोप लगाया कि उनका फेसबुक अकाउंट ब्लॉक करवाया गया। वहीं, मुख्यमंत्री सुक्खू द्वारा कथित तौर पर नशे की प्रवृत्ति वाले व्यक्ति जैसी टिप्पणी किए जाने के बाद नीरज भारती ने भी पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री पर तंबाकू और खैनी खाने तथा "अटैचियों" के जरिए पैसों के लेन-देन जैसे गंभीर आरोप लगाए। आरोपों और प्रत्यारोपों की यह लड़ाई अब व्यक्तिगत कटाक्षों के स्तर तक पहुंच चुकी है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि नीरज भारती वरिष्ठ कांग्रेस नेता और कृषि मंत्री चंद्र कुमार के पुत्र हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिता और पुत्र के राजनीतिक कद के बावजूद मौजूदा विवाद को नियंत्रित करना आसान नहीं रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि मंत्री चंद्र कुमार भी इस सियासी नुकसान को रोक पाने में असहाय दिखाई दे रहे हैं।
इससे भी अधिक दिलचस्प तथ्य यह है कि कांग्रेस का शायद ही कोई बड़ा नेता नीरज भारती के खिलाफ खुलकर सामने आया है। पार्टी ने संगठनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें निष्कासित अवश्य कर दिया, लेकिन सार्वजनिक रूप से उनके खिलाफ मुखर बयान देने से अधिकांश वरिष्ठ नेता बचते हुए दिखाई दिए। यह स्थिति कहीं न कहीं इस बात का संकेत भी मानी जा रही है कि पार्टी के भीतर मौजूद असंतोष उतना सीमित नहीं है, जितना ऊपर से दिखाई देता है।
विडंबना यह है कि यही नीरज भारती पिछली भाजपा सरकार के दौरान कांग्रेस की वैचारिक लड़ाई के सबसे आक्रामक चेहरों में गिने जाते थे। जब कई नेता चुप्पी साधे रहते थे, तब सोशल मीडिया पर भाजपा के खिलाफ वैचारिक संघर्ष में नीरज भारती लगभग अकेले मोर्चा संभाले दिखाई देते थे। भाजपा नेताओं और समर्थकों के साथ उनकी तीखी बहसें अक्सर सुर्खियां बनती थीं और वे कांग्रेस की विचारधारा और नीतियों के सबसे मुखर रक्षकों में से एक माने जाते थे।
लेकिन राजनीति की विडंबना देखिए, जो नेता कभी कांग्रेस के लिए सबसे प्रखर वैचारिक योद्धा माना जाता था, आज वही अपनी ही पार्टी और अपनी ही सरकार के लिए सबसे बड़ी असहजता का कारण बन गया है।
ऐसे में यह कहावत अनायास ही याद आती है—
"सनम, हम तो डूबेंगे… पर तुम्हें भी ले डूबेंगे!"
क्योंकि जब लड़ाई विरोधियों से नहीं, बल्कि अपनों से हो, तो नुकसान का दायरा कहीं अधिक व्यापक हो जाता है। और शायद यही वजह है कि हिमाचल कांग्रेस में छिड़ी यह जंग केवल दो व्यक्तियों की लड़ाई नहीं, बल्कि संगठन, नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती दूरी की कहानी बनती जा रही है।
(लेखक:- रूपांश राणा! यह लेख सार्वजनिक बयानों और राजनीतिक घटनाक्रम के विश्लेषण पर आधारित है। लेख में उल्लिखित आरोप संबंधित नेताओं द्वारा लगाए गए आरोपों और दावों का उल्लेख करते हैं)
