सिस्टम से लड़कर जीता हक! 7 सालों बाद सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैंसला, सरकार को ADA की नौकरी तथा 5 लाख मुआवजा देने के भी आदेश

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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाले फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी व्यक्ति की दिव्यांगता का प्रतिशत उसकी योग्यता या कार्यक्षमता तय करने का आधार नहीं हो सकता। Prabhu Kumar बनाम State of Himachal Pradesh मामले में अदालत ने हिमाचल प्रदेश सरकार के उस फैसले को अवैध और मनमाना करार दिया, जिसमें एक 90% दिव्यांग वकील को केवल इस आधार पर नौकरी से वंचित कर दिया गया था कि उसकी दिव्यांगता तय सीमा से अधिक है।

यह मामला वर्ष 2018 की उस भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसमें हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग ने Assistant District Attorney (ADA) के पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। इन पदों में से दो पद दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थे और विज्ञापन में यह शर्त रखी गई थी कि उम्मीदवार की दिव्यांगता 40% से कम और 60% से अधिक नहीं होनी चाहिए। याचिकाकर्ता, जो 90% locomotor disability से ग्रसित हैं और कई वर्षों से वकालत कर रहे हैं, ने इस भर्ती में भाग लिया। उन्होंने लिखित परीक्षा और साक्षात्कार दोनों सफलतापूर्वक पास किए और दिव्यांग श्रेणी में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। इसके बावजूद, राज्य सरकार ने उन्हें नियुक्ति देने से इनकार कर दिया।

सरकार का तर्क था कि चूंकि याचिकाकर्ता की दिव्यांगता 60% से अधिक है, इसलिए वह निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है। इस फैसले को पहले हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने भी सही ठहराया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे दृष्टिकोण को गलत मानते हुए हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 केवल न्यूनतम 40% दिव्यांगता को मानक के रूप में निर्धारित करता है, ताकि ऐसे व्यक्तियों को आरक्षण का लाभ मिल सके। कानून में कहीं भी अधिकतम सीमा तय करने का प्रावधान नहीं है। ऐसे में सरकार द्वारा 60% की ऊपरी सीमा तय करना न केवल कानून की भावना के खिलाफ है, बल्कि यह उन लोगों के अधिकारों का हनन भी है, जिनकी दिव्यांगता अधिक है लेकिन वे पूरी तरह सक्षम हैं।

अदालत ने विशेष रूप से “reasonable accommodation” के सिद्धांत पर जोर दिया, जिसके अनुसार राज्य का दायित्व है कि वह दिव्यांग व्यक्तियों को समान अवसर देने के लिए आवश्यक सुविधाएं और अनुकूलन प्रदान करे। कोर्ट ने कहा कि केवल दिव्यांगता के प्रतिशत के आधार पर किसी को अयोग्य ठहराना एक सतही और भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण है। किसी भी व्यक्ति की वास्तविक क्षमता का आकलन उसके कार्य करने की योग्यता और प्रदर्शन के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि केवल मेडिकल प्रतिशत के आधार पर।

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता पिछले कई वर्षों से सफलतापूर्वक वकालत कर रहे हैं और उन्होंने चयन प्रक्रिया में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। ऐसे में यह मान लेना कि वह केवल अधिक दिव्यांगता के कारण इस पद के योग्य नहीं हैं, पूरी तरह अनुचित है। अदालत ने यह भी कहा कि Assistant District Attorney का कार्य मुख्य रूप से बौद्धिक और कानूनी प्रकृति का होता है, जिसमें शारीरिक अक्षमता का सीधा प्रभाव नहीं पड़ता।

अपने अंतिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर ADA पद पर नियुक्त किया जाए। यदि पद उपलब्ध न हो, तो एक अतिरिक्त (supernumerary) पद बनाया जाए। साथ ही, नियुक्ति को 19 सितंबर 2019 से प्रभावी माना जाए और याचिकाकर्ता को सभी संबंधित लाभ दिए जाएं। अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता को अनुचित रूप से लंबे समय तक न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ा, इसलिए राज्य सरकार पर ₹5 लाख का जुर्माना लगाया गया, जो याचिकाकर्ता को भुगतान किया जाएगा।

यह फैसला दिव्यांग अधिकारों के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि समानता का अधिकार केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक होना चाहिए, और किसी भी प्रकार का भेदभाव—चाहे वह नीति के नाम पर ही क्यों न हो—संविधान के खिलाफ है।

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