हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य वक़्फ़ बोर्ड के गठन में हुई देरी पर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है। रेहमतुल्लाह नाम के व्यक्ति की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पूछा है कि बोर्ड का पाँच साल का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद नया बोर्ड क्यों नहीं बनाया गया, जबकि वक़्फ़ अधिनियम के तहत बोर्ड को निरंतर कार्यशील रखना सरकार की कानूनी जिम्मेदारी है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि 2017 में गठित हिमाचल वक़्फ़ बोर्ड ने अपना पाँच साल का कार्यकाल पूरा कर लिया, लेकिन इसके बाद नया बोर्ड न तो गठित किया गया और न ही सदस्यों के चुनाव या नामांकन की प्रक्रिया शुरू की गई। इस बीच सरकार ने कथित तौर पर एक व्यक्ति को सदस्य के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की, जिस पर सवाल उठाते हुए दलील दी गई कि जब खुद बोर्ड ही अस्तित्व में नहीं है तो अकेले किसी व्यक्ति को सदस्य या प्रतिनिधि मानने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि वक़्फ़ बोर्ड एक संवैधानिक संस्था है और उसका कार्यकाल समाप्त होने पर सरकार को निर्धारित समय के भीतर नया बोर्ड गठित करना अनिवार्य है, नहीं तो वक़्फ़ संपत्तियों की देखरेख और प्रशासन अधर में लटक जाता है। इसीलिए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह अगली तारीख से पहले विस्तृत कम्प्लायंस रिपोर्ट दाखिल करे और बताए कि बोर्ड का कार्यकाल कब समाप्त हुआ, उसके बाद अब तक नया बोर्ड क्यों नहीं बनाया गया और इस दौरान वक़्फ़ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए क्या वैधानिक व्यवस्था अपनाई गई।
